शायद ही लोग यह बात जानते हैं कि स्वतंत्रता के लिए लड़ी गई पहली लड़ाई 1857 का विद्रोह नहीं थी । झारखण्ड में तो अंग्रेज़ो के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत 18 वीं शताब्दी में ही हो गई थी। झारखंड के आदिवासियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बिहार बंगाल, औड़िसा का दीवानी अधिकार मिलने के कुछ ही समय बाद अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत कर दी थी। लेकिन उनके विद्रोहों को इतिहास में अनदेखा कर दिया गया।

अंग्रेज़ों के खिलाफ जंग की शुरुआत बाबा तिलका मांझी के नेतृत्व में मंगल पांडे के जन्म से 90 वर्ष पूर्व सन 1770 में ही शुरू हो चुकी थी। तिलका मांझी का जन्म 1750 ई. में तिलकपुर गावं में हुआ था। उन्होंने अन्याय और गुलामी के खिलाफ जंग छेड़ी थी।

तिलका मांझी राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए भागलपुर में स्थानीय लोगों को सभाओं में संबोधित करते थे। जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोगों को राष्ट्र के लिए एकत्रित होने का आह्वान करते थे। तिलका मांझी ने राजमहल की पहाड़ियों में अंग्रेज़ों के खिलाफ कई लड़ाईयां लड़ी। सन 1770 में पड़े अकाल के दौरान तिलका मांझी के नेतृत्व में संथालों ने सरकारी खज़ाने को लूट कर गरीबो में बांट दिया, जिससे गरीब तबके के लोग तिलका मांझी से प्रभावित हुए और उनके साथ जुड़ गए। इसके बाद तिलका मांझी ने अंग्रेज़ों और सामंतो पर जोरदार हमले किए। हर बार तिलका मांझी ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए।

सन 1784 में तिलका मांझी ने भागलपुर पर हमला किया और 13 जनवरी 1784 को ताड़ के पेड़ पर चढ़कर घोड़े पर सवार अंग्रेज़ कलेक्टर अगस्टस क्लीवलैंड को अपने विष भरे तीर से मार गिराया।

क्लीवलैंड की मौत से ब्रिटिश सेना में आतंक मच गया। तिलका मांझी और उनके साथियों के लिए यह एक बड़ी कामयाबी थी। जब तिलका मांझी और उनके साथी इस जीत का जश्न मना रहे थे तब रात के अंधेरे में अंग्रेज सेनापति आयरकूट ने हमला बोला। तिलका मांझी इस हमले में बच निकले और राजमहल की पहाड़ियों में शरण लेकर अंग्रेज़ों के खिलाफ छापेमारी जारी रखी। इसपर अंग्रेज़ों ने पहाड़ों की घेराबंदी करके तिलका मांझी तक पहुंचने वाली तमाम सहायता रोक दी। मजबूरन तिलका मांझी को अन्न और पानी के अभाव के कारण पहाड़ों से निकल कर लड़ना पड़ा और वे पकड़े गए। कहते हैं कि तिलका मांझी को चार घोड़ों से घसीट कर भागलपुर ले जाया गया था और बरगद के पेड़ से लटकाकर उन्हें फांसी दे दी गई थी।

तिलका मांझी के बलिदान को इतिहासकारों ने भले ही नजरअंदाज़ कर दिया हो, लेकिन राजमहल के आदिवासी इलाकों में उनकी याद में कितने ही लोकगीत गुनगुनाए जाते है। उनके साहस की कथाएं आज भी सुनाई जाती है। बिहार के भागलपुर में तिलका मांझी के नाम पर 12 जुलाई 1960 में तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय नामकरण किया गया था। आज भी झारखण्ड में लोग तिलका मांझी को ही प्रथम स्वतंत्रता सेनानी और सहीद मानते हैं।

Unnat Kumar Singh,
In-House Reporter, Info India TV

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