नीतीश कुमार ने महज 16 घंटे में पहले इस्तीफे और फिर शपथ लेकर जो रिकॉर्ड बनाया है वैसा उदाहरण भारतीय राजनीति में दूसरा नहीं दिखता…बीते कुछ दिनों से बिहार में जो राजनीति चल रही है वो हमें बहुत कुछ सिखाती है…सियासत की इस खेल में हर किसी की जद्दोजहद दिखी…शाम छह बजे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे कर और सुबह 10 बजे फिर से सीएम पद की शपथ लेने का निर्णय इतना आसानी ने यूँ चंद घंटो की मोहताज नहीं है…यानी कि जो कुछ भी हुआ कल बिहार में वो पहले से ही योजना का पात्र था…

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अब सोचने वाली बात यह है कि अगर नीतीश को जेडीयू से नाता तोड़कर बीजेपी से हाथ मिलाना ही था, तो उन्होंने खुद इस्तीफा क्यों दिया जबकि उनके पास तेजस्वी यादव को बर्खास्त करने का ज्यादा आसान विकल्प था?…तो यह राजनीति के दांव-पेंच का ही हिस्सा था…दरअसल नीतीश आरजेडी को पीड़ित बनने का मौका देने के बजाय खुद को त्यागी दिखाना ज्यादा फायदे का सौदा समझते थे, इसीलिए उन्होंने सबको चौंकाते हुए अपने इस्तीफे का दांव चला…नीतीश ने तेजस्वी को बर्खास्त कर उन्हें विक्टिम बनने का मौका नहीं दिया… क्योंकि इससे तेजस्वी राज्य में सहानुभूति बटोर सकते थे और उनका राजनीतिक कद भी इससे बढ़ सकता था…तेजस्वी को बर्खास्त करने की बजाय जब नीतीश खुद इस्तीफा देने राजभवन पहुंच गए तो उन्होंने एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने में कामयाबी हासिल की कि ‘वो करप्शन से समझौता नहीं करेंगे भले ही इसके लिए उन्हें अपनी कुर्सी छोड़नी पड़े’… जिससे नितीश को उनके एजेंडा के चलते बीजेपी का सहारा मिल गया…रही सही कसर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन ट्वीट्स ने कर दी जिसमें उन्होंने नीतीश को उनके इस्तीफे के लिए बधाई दी…तो था ना यह राजनीतिक षड़यंत्र जिसमें राजद काफी बूरे फंसे…

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