मिटते निशां के इस कड़ी मैं इन्फो इंडिया की एक कोशिश है आपको उस दौर की याद दिलाने की…जब संवाद के लिए मेल, व्हाट्सप या वीडियो कॉल का सहारा नहीं था बल्कि पत्राचार के लिए पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय और लिफाफों का प्रचलन हुआ करता था….तब हम और आप…दिनों और हफ़्तों तक एक खत का इंतज़ार करते थे…अपने जज़्बात को कागज़ में पिरोते थे…आज सब कुछ आसान और तुरंत हो जाता है….पर इससे पहले की हम अपने जज़्बात उड़ेल पाए….वक़्त कहीं दूर निकल आता है…..

प्रस्तुत है एक रिपोर्ट इंतेखाब आलम और कैमरा मैन अभिजीत सिंह की नज़रों से…

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